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श्रीलंका के विरुद्ध टेस्ट के लिए भारत की जिस टीम को चुना है, उसमें एक नाम सौरभ कुमार का है। पहला सवाल यही होगा- कौन सौरभ कुमार? 
घरेलू क्रिकेट को ज्यादा चर्चा मिलती नहीं और टीम इंडिया के नेट्स पर कौन गेंदबाजी करते हैं- इस पर कोई ध्यान नहीं देता। इसके अतिरिक्त जिसने अब तक एक भी आईपीएल मैच न खेला हो- वह कहां से मशहूर हो? उस पर लगभग ख़त्म हो रही, बाएं हाथ की स्पिन गेंदबाजी की पुरानी स्टाइल वाला गेंदबाज। पिछले साल चेन्नई टेस्ट में अक्षर के चोटिल होने पर भी टेस्ट टीम में थे- पर मालूम था कि आख़िरी इलेवन में जगह नहीं मिलेगी। इसीलिए किसी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया ।   
बहरहाल पिछले लगभग डेढ़-दो साल से टीम इंडिया के नेट्स पर गेंदबाजी कर रहे (वे पिछली सीरीज के लिए दक्षिण अफ्रीका भी गए थे) सौरभ की मेहनत बेकार नहीं गई। इतना ही नहीं, टीम की स्टाइल की सोच भी बदली है- टेस्ट टीम में दो स्पिनर सौरभ कुमार और कुलदीप यादव एक साथ हैं। सौरभ को जब टीम में चुने जाने की खबर मिली- वे गुरुग्राम में उत्तर प्रदेश-विदर्भ रणजी ट्रॉफी मैच खेल रहे थे।  
ये बात पिछले कई साल से चर्चा में है कि भारत में क्रिकेट के विकास की सबसे बड़ी उपलब्धि ये है कि उन जगह से क्रिकेटर सामने आ रहे हैं- जिनका नाम उस स्टेट में भी शायद सभी को मालूम न हो। सौरभ, बागपत डिस्ट्रिक्ट के बड़ौत से हैं- कहां है ये? अब इस सवाल का जवाब ज्यादा मुश्किल नहीं होगा- सौरभ की बदौलत। ये ठीक है कि उनकी क्रिकेट को दिल्ली में निखारा गया पर वे अपनी जमीन को भूले नहीं और अब उसी उत्तर प्रदेश के लिए खेलते हैं, जिसमें बागपत डिस्ट्रिक्ट है।  
सौरभ की गेंदबाज़ी का परिचय- पारंपरिक बाएं हाथ के स्पिनर जो डिलीवरी को लूप देते हैं और बाकी का काम, टर्फ से टकराने के बाद गेंद अपने आप करती है। उनकी गेंद पर कुछ चौके और छक्के लगें- उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इस आर्ट को निखारा अपने समय के मशहूर और दिग्गज खब्बू गेंदबाज बिशन सिंह बेदी ने। बागपत के बड़ौत में, कोई अच्छी कोचिंग सुविधा नहीं थी- इसलिए ट्रेन से दिल्ली आना नेशनल स्टेडियम में ट्रेनिंग के लिए। रोज नौकरी के लिए आने वालों का ऐसी ट्रेन की जगह-जगह चेन खींचना कोई अनोखी घटना नहीं था पर सौरभ के लिए हर बार ट्रेन रुकने का मतलब था ट्रेनिंग के लिए लेट होना। हर दिन ट्रेनिंग के लिए साढ़े तीन घंटे ट्रेन का सफर और उसके बाद आधा घंटा स्टेडियम पहुँचने के लिए- फिर इतना ही वापस जाना। ये सब आसान नहीं था पर क्रिकेट खेलने के लिए जुनून था- तभी ऐसा हो सका। यही मेहनत अब रंग ला रही है।   पहली कोच सुनीता शर्मा- भारत की एकमात्र महिला क्रिकेट द्रोणाचार्य अवार्डी और कई इंटरनेशनल क्रिकेटर उनसे ट्रेनिंग ले चुके हैं। कुछ साल पहले तक बिशन सिंह बेदी समर ट्रेनिंग कैंप लगाया करते थे और ढेरों युवा वहां प्रेक्टिस  करते थे। बेदी ने सौरभ की गेंदबाजी में जो देखा उसे पसंद किया, उसे निखारने की टिप्स दीं। एक्शन पसंद था- इसलिए उसे नहीं बदला। इन समर कैंप के दौरान ढेरों ओवर फेंकने का मौका मिला क्योंकि बेदी का मंत्र हमेशा रहा- ‘मेहनत में कमी नहीं होनी चाहिए और सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं।’
कुछ ख़ास उपलब्धियां :
  16 साल की उम्र में  क्रिकेट खेलना शुरू।    2014 में सर्विसेज के लिए हिमाचल प्रदेश के विरुद्ध पहला फर्स्ट क्लास मैच खेला।    उत्तर प्रदेश के लिए 2015-16 में, गुजरात के विरुद्ध अपने पहले मैच में 10 विकेट।   पिछले दो फर्स्ट क्लास सीजन (2018-19, 2019-20) में 95 विकेट।  पिछले रणजी सीजन (2019-20) में 21.09 औसत से 44 विकेट।  2018-19 में 51 विकेट।  दलीप ट्रॉफी में 19 विकेट।   फर्स्ट क्लास रिकॉर्ड (20 फरवरी 2022 तक) : 47 मैच, 199 विकेट, 16 बार 5 विकेट और 6 बार 10 विकेट, पारी में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 7/32 और मैच में 14/65।  लिस्ट ए क्रिकेट में : 25 मैच, 37 विकेट।  टी20 में : 33 मैच में 24 विकेट। 
पिता आल इंडिया रेडियो में जूनियर इंजीनियर थे और अपने बेटे के क्रिकेट जुनून में उसका पूरा साथ दिया। उत्तर प्रदेश के लिए, जूनियर क्रिकेट के बाद जब सीनियर क्रिकेट में मौका मिलना चाहिए था तो टीम में कई सीनियर्स की मौजूदगी में उनके लिए कोई जगह नहीं थी। खेलने के मौके के लिए एक सीज़न (2014-15) सर्विसेज के लिए खेले- जहां स्पोर्ट्स कोटे में एयर फोर्स में नौकरी मिल गई थी। जैसे ही उत्तर प्रदेश टीम में जगह बनी तो एयर फोर्स की नौकरी भी छोड़ दी- स्पोर्ट्स कोटे का मतलब था कि उनके लिए खेलो। सरकारी नौकरी छोड़ना आसान नहीं होता।   
इसके बाद क्रिकेट में, पीछे मुड़कर नहीं देखा। गेंदबाजी का मतलब ये नहीं कि बैट के साथ अनाड़ी हैं- निचले मध्य क्रम में टीम की जरूरत में रन बना सकते हैं- सबूत 30.12 औसत से 2 सेंचुरी और 50 वाले 9 स्कोर के साथ 47 मैच में 1657 रन।  

ऐसा नहीं कि आईपीएल कॉन्ट्रेक्ट नहीं मिला- पंजाब किंग्स और राइजिंग पुणे सुपरजायंट्स का हिस्सा रह चुके हैं। पुणे ने 2017 में नीलामी में 10 लाख रुपए में खरीदा और पंजाब ने 2021 की आईपीएल नीलामी में 20 लाख रुपए में पर किसी ने एक मैच में भी नहीं खिलाया।

वे सेलेक्टर्स की स्कीम में हैं- इसका सबूत पिछले सीजन में तब मिला जब दक्षिण अफ्रीका के इंडिया ए टीम टूर के लिए चुना गया। यही अनुभव टीम इंडिया के नेट्स पर काम आया। अब टेस्ट इलेवन में आने का इंतजार है। 

-चरनपाल सिंह सोबती

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