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आम तौर पर कहा ये जाता है कि बॉलीवुड के अब तक के सबसे बड़े स्टार कहलाने के हक़दार, दिलीप कुमार फुटबॉल के दीवाने थे। ये सच है पर साथ साथ ये भी सच है कि वे क्रिकेट से भी जुड़े थे- क्रिकेट मैच हो या क्रिकेट की पार्टियां , जहां मौका मिले जरूर जाते थे। जब शारजाह में शेख बुख़ातिर की CBFS मैचों का आयोजन करती थी तो दिलीप कुमार का नाम हर टूर्नामेंट के लिए उनकी मेहमानों की लिस्ट में होता था- वे जाएं या न जाएं ये अलग बात है। अब यादें बची हैं।

देश की सीमा का कोई बंधन नहीं- सीमा पार पकिस्तान में भी वे खूब लोकप्रिय थे। इसकी वजह सिर्फ ये नहीं थी कि उनका जन्म आज के पकिस्तान में हुआ था। मोहम्मद यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार का जन्म 11 दिसंबर,1922 को पेशावर में हुआ- 1930 के दशक में अपने परिवार के साथ मुंबई चले आए और उसके बाद वहीं रहे। उनके पुश्तैनी घर को नेशनल हेरिटेज घोषित कर चुकी है पकिस्तान सरकार।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और उनके वर्ल्ड कप विनर कप्तान, इमरान खान भी उन्हें भूले नहीं। इमरान ने उनकी मौत की खबर सुन कर याद किया कि जब वे अपनी मां की याद में कैंसर हॉस्पिटल बनाने के लिए पैसा जुटा रहे थे तो दिलीप कुमार ने भी उनकी बड़ी मदद की थी। वह बड़ा मुश्किल वक़्त था इमरान के लिए पैसे के मामले में। ऐसे में दिलीप कुमार मदद के लिए न सिर्फ पाकिस्तान गए, लंदन भी पहुंचे और उनकी मौजूदगी ने बड़ी रकम जुटाने में मदद की।

उनकी मदद को तो टेस्ट क्रिकेटर यशपाल शर्मा ने भी (अपनी मौत से सिर्फ दो दिन पहले) याद किया। दिलीप कुमार उनके लिए पिता की तरह थे। किस्सा ये है कि यशपाल मानते थे कि दिलीप कुमार ने उनके करियर को ऊपर उठाकर उनकी जिंदगी बदल दी।1974-75 सीजन में दिलीप कुमार दिल्ली के करीब मोहन नगर में पंजाब- यूपी रणजी नॉकआउट मैच देखने आए। यशपाल ने दोनों पारी में सेंचुरी बनाई। उनकी दूसरी पारी की सेंचुरी को देखने वालों में दिलीप कुमार भी थे।

बाद में बातचीत में उन्होंने यशपाल को न सिर्फ बधाई दी- ये भी कहा कि ‘किसी से’ उनके नाम की सिफारिश करेंगे। यशपाल को जल्दी ही पता लग गया कि दिलीप कुमार ने उनके नाम का जिक्र उस समय के एक प्रभावशाली क्रिकेट एडमिनिस्ट्रेटर राज सिंह डूंगरपुर से किया और इसके बाद बहुत जल्दी यशपाल भारत की टीम में थे। यशपाल ने उनकी ज्यादातर फिल्में देखीं- उन्होंने एक बार यशपाल को फिल्म क्रांति की शूटिंग देखने के लिए भी आमंत्रित किया था। मनिंदर सिंह ने यशपाल को याद करते हुए बताया कि टीम ड्रेसिंग रूम में जब एक ही टीवी होता था तो यशपाल बस दिलीप कुमार की फिल्म की ही वीडियो चलाते रहते थे।

वैसे शूटिंग देखने के निमंत्रण पर एक और याद का पिटारा खुलता है। पाकिस्तान के क्रिकेटर और मशहूर पत्रकार कमार अहमद ने (जब वे विभाजन से पहले बिहार में रहते थे तो) जो पहली फिल्म देखी वह दिलीप कुमार की जुगनू (1947) थी। अहमद जब लंदन में बीबीसी में थे तो भारत में पाकिस्तान की 1979-80 क्रिकेट सीरीज कवर करने उन्हें भेजा गया। उस टूर में वे अपने मनपसंद स्टार से कई बार मिले। पहले तो दिल्ली के ताज होटल में पाकिस्तान हाई कमीशन के एक प्रोग्राम में। दोबारा मिले देव आनंद के घर डिनर पर। जब दिलीप कुमार को पता चला कि वे लंदन से बीबीसी के रिपोर्टर हैं तो फिल्म शक्ति की शूटिंग देखने उन्हें आमंत्रित किया। इस बात को कमार अहमद ने अपनी किताब ‘फ़ार मोर दैन ए गेम’ में भी लिखा है।

इतना ही नहीं, दिलीप कुमार ने उनके लिए अपनी एक कार भी भेजी। शक्ति के आखिरी सीन की शूटिंग कर रहे थे उस दिन। शूटिंग के बाद उन्होंने चाय वाले से कहा – ‘देखो, ये पाकिस्तान के मेरे दोस्त हैं। इनके लिए वही स्पेशल चाय लाओ, जो मेरे लिए बनाते हो।’

जब भी मौका मिले तो वे खेलते भी थे और अपनी फिल्मों की तरह पूरी मेहनत से। शूटिंग से जरा सी फुर्सत मिलती थी तो चल रहे मैच का स्कोर पूछते थे। एक बार मुंबई में ब्रेबोर्न स्टेडियम में एक चैरिटी मैच खेले – उसमें क्रिकेटर और फिल्म स्टार दोनों खेले थे। सलीम दुर्रानी उन दिनों खूब लोकप्रिय थे- इसलिए भी कि ‘चरित्र’ नाम की फिल्म में काम कर रहे थे और परवीन बाबी उनकी हीरोइन थीं। जब ये तेज तर्रार पठान बैटिंग करने आए तो भीड़ में जोश देखने वाला था। अमिताभ बच्चन की बाएं हाथ से अच्छी धीमी गेंदबाजी ने उन्हें रोके रखा। बेकाबू भीड़ छक्के के लिए चिल्ला रही थी और तभी दुर्रानी ने जोश में एक जोरदार शॉट लगा दिया। गेंद बॉउंड्री के ऊपर जा रही थी। उसी वक़्त मैच के दूसरे पठान यानि कि दिलीप कुमार ने डाइव लगाई और एक हाथ से कैच लपक लिया। स्टेडियम में सन्नाटा छा गया। दुर्रानी चुपचाप लौट आए।

बाद में दिलीप कुमार को अपनी टीम के कप्तान राज कपूर से बातें सुननी पड़ीं- “अरे ये क्या कर डाला- वे सलीम दुर्रानी की बल्लेबाजी देखने आए थे, दिलीप कुमार को कैच लपकते देखने के लिए नहीं!”

कीनिया के इंटरनेशनल अंपायर सुभाष मोदी ने भी उनसे हुई मुलाकात को याद किया- ‘मैं कीनिया प्रीमियर क्लब के साथ 1975 में भारत और श्रीलंका टूर पर था। टूर के दौरान सीसीआई में दिलीप कुमार और सायरा बानो से मिला था। दिलीप साहब तब मुंबई के मेयर थे। दोनों मिलनसार और बड़े जोश से मिले। में कभी भूलूंगा नहीं।’

आपको ये जानकार हैरानी होगी कि दिलीप कुमार के नाम का जिक्र तो वेस्टइंडीज के पूर्व कप्तान सर गैरी सोबर्स ने भी अपनी ऑटोबायोग्राफी में किया है। सोबर्स ने लिखा- ‘हम मुंबई में ब्रीच कैंडी होटल में ठहरे थे और उन दिनों कई फिल्म स्टार भी वहां ठहरे हुए थे। हर सुबह वॉक के दौरान बॉलीवुड के एक टॉप स्टार दलीप सिंह (सोबर्स ने नाम गलत लिखा) को मैं देखता था। वह बाद में मुझे देखकर नाश्ते में शामिल होने के लिए भी अपनी टेबल पर बुलाते थे। ये तो मुझे बाद में पता लगा कि वे कितने बड़े फिल्म स्टार हैं। उन्होंने मुझे शूटिंग देखने के लिए भी बुलाया था।’

दिलीप साहब नहीं रहे पर क्रिकेट में उनकी यादों का जिक्र हमेशा होगा।

  • चरनपाल सिंह सोबती
One thought on “फुटबॉल ही नहीं , यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार क्रिकेट के भी दीवाने थे”
  1. बहुत बढीया जानकारी स्वः दिलीप साहब क्रिकेट के ईतने शौकीन थे . हमे बहुद पसंद आया 👍👌👌

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