fbpx

बड़े और छोटे देश के बीच का क्रिकेट अंतर लगातार कम होता जा रहा है- ख़ास तौर पर टी20 में। यहां छोटे का मतलब क्षेत्रफल (एरिया) में नहीं- क्रिकेट खेलने की प्रतिष्ठा/मशहूरी से है। टी20 ने इन्हें वह मौका दिया जिसकी उन्हें जरूरत है। जो कहते थे कि क्रिकेट का ये छोटा फॉर्मेट, क्रिकेट डेवलपमेंट के लिए सबसे जरूरी फैक्टर है- वे सही थे। यहां तक कि अब तो ऐसा लगने लगा है कि ऐसा ही एक ‘छोटा’ देश क्रिकेट को वहां पहुंचा सकता है, जहां इसे बड़े देश न पहुंचा पाए।

क्रिकेट में डेवलपमेंट के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है। एक विश्व खेल होने के नाते अगर वर्ल्ड कप में अभी भी 20 टीम ही खेल रही हैं तो साफ़ है कि लोकप्रियता में, तुलना में फीफा वर्ल्ड कप की बराबरी पर आने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। तब भी, इस स्टेटमेंट के बावजूद, ये मानना होगा कि पिछले कुछ साल में बहुत आगे आए हैं। अब क्रिकेट किसी एक ख़ास देश का खेल नहीं है- इसका मजा दुनिया के कई देश में लिया जा रहा है। क्रिकेट ऐसा खेल बन गया है जो लोगों को एक साथ ला रहा है, विभिन्न संस्कृति और भाषा को जोड़ रहा है। यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका और कैरिबियन में इस वर्ल्ड कप का आयोजन उसी सोच और डेवलपमेंट का नतीजा है।

टूर्नामेंट में 20 टीम- इनमें से कुछ जैसे कि पापुआ न्यू गिनी, युगांडा, ओमान और नेपाल तो ऐसे हैं जिनके बारे में इसी वर्ल्ड कप में खेल रहे बड़े क्रिकेट देशों में शायद ये भी सभी को मालूम नहीं होगा कि ये देश भी इतना आगे निकल आए हैं कि न सिर्फ वर्ल्ड कप खेलें- वर्ल्ड कप में किसी भी टीम को हारने के लिए बराबर फुटिंग पर मैच खेलें। ये आईसीसी की क्रिकेट को ग्लोबल बनाने की कोशिशों का नतीजा है। डलास में पाकिस्तान पर यूएसए की जीत का मजा क्रिकेट की दुनिया के हर देश ने लिया।

अब जबकि ग्रुप राउंड पूरा हो गया और सुपर 8 में आ चुके हैं तो ये सवाल चर्चा योग्य है कि वर्ल्ड कप में इतनी ज्यादा टीम को मौका देने से हासिल क्या हुआ और छोटे देशों को खेलने का मौका देने की ये स्ट्रेटजी कितनी कामयाब रही है? 50 ओवर वर्ल्ड कप में 1975 से ही छोटी टीम को खेलने का मौका दे रहे हैं पर कुल मिलाकर आईसीसी पर यही आरोप है कि उन्होंने क्रिकेट को दुनिया भर में फैलाने के लिए कुछ ख़ास नहीं किया। सालों की दुविधा के बाद, टूर्नामेंट को बड़ा करने/न करने के सवाल के बीच झूलने के बाद, आईसीसी ने आखिर में टी20 को क्रिकेट को फ़ैलाने के लिए चुना और कोशिश की। अब सोचने वाली बात ये है कि इसके मैच कितने बेहतर रहे और टीम खुद कैसा मुकाबला कर सकीं? अमेरिका में इन्हें जो मौका मिला उसे देखते हुए इन सवाल का जवाब यही है कि डेवलपमेंट के तराजू में इससे बेहतर प्रदर्शन नहीं डाला जा सकता था।

संयोग से यूएसए ने ही सबसे बड़ी प्रोग्रेस दिखाई। डलास में पाकिस्तान को हराना टी20 वर्ल्ड कप इतिहास में सबसे बड़े झटकों में से एक था- कुछ जानकार की नजर में 2009 में लॉर्ड्स में नीदरलैंड से इंग्लैंड की हार के बराबर। तब भी इस उलटफेर में पाकिस्तान के अपने योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता। वे सबसे असंतुलित टीम (जिसे चुनने के लिए सबसे ज्यादा दिन लिए) और सबसे अधूरी तैयारी के साथ इस वर्ल्ड कप में खेलने आए। ये जीत अमेरिका के लिए तुक्का नहीं थी- एरोन जोन्स की टीम ने उसके बाद भी उस बेहतर क्रिकेट को खेलना जारी रखा जिसने उन्हें कनाडा और पाकिस्तान पर जीत दिलाई। सुपर 8 में उनकी एंट्री अपने आप में एक इतिहास है। यहीं भी वे कोई और कमाल कर दें तो कोई हैरानी नहीं होगी।

पाकिस्तान पर यूएसए की जीत टी20 वर्ल्ड कप के इतिहास में एक एसोशिएट टीम की टेस्ट देश पर 14वीं जीत थी। इसके बाद जल्दी ही 15वीं जीत भी सामने आई- कनाडा ने न्यूयॉर्क में आयरलैंड को हराया। टेस्ट दर्जा हासिल करने के बाद आयरलैंड अब खुद मुश्किल में है। नेपाल को भी वास्तव में अपने आख़िरी ग्रुप-स्टेज मैच में दक्षिण अफ्रीका को हराना चाहिए था लेकिन 1 रन से हार गए। अगर डेल स्टेन ने ये कहा कि ये मैच नेपाल को जीतना चाहिए था तो अपने आप अंदाजा हो जाएगा कि किसने अपने स्तर की ऊंचाई को पार किया।

स्कॉटलैंड ने भी अपना सम्मान बढ़ाया और एसोसिएट्स में सबसे मजबूत टीम के तौर पर गिन रहे हैं उन्हें- ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध मैच के आख़िरी ओवर में एक कैच छूटना ही शायद उनके सुपर 8 के लिए क्वालीफिकेशन और घर वापस आने के बीच का अंतर रहा। वे आक्रामक क्रिकेट खेलते हैं- उनके पास स्किल है, टेलेंट है और विविधता वाला अटैक है। कौन जानता है कि अगर इंग्लैंड के विरुद्ध उनके मैच में बारिश की दखल न होती तो क्या होता? वे ग्रुप बी में अन्य एसोसिएट्स, ओमान और नामीबिया से कहीं बेहतर थे। वे सम्मान के साथ घर वापस लौटे।

इस सब के बावजूद ये भी मानना होगा कि जरूरी नहीं कि इन छोटी टीमों के टेस्ट देश से मैच ही एकतरफ़ा होते हैं। अफ़गानिस्तान ने न्यूज़ीलैंड को हराया पर इसकी यूगांडा की वेस्टइंडीज़ के विरुद्ध दुर्दशा से तुलना नहीं की जा सकती। वे तो 39 रन पर आउट हो गए और ओमान की टीम इंग्लैंड के हाथों 102 मिनट और 99 गेंद तक चले मैच में हार गई।ओमान ने जो क्रिकेट खेला उस पर दुनिया भर में सोशल मीडिया पर बहुत कुछ लिखा गया और ज्यादातर ने उनकी क्रिकेट के स्तर पर सवाल उठाए। वर्ल्ड कप में ‘वर्ल्ड’ को सही ठहराने के लिए बहुत ज्यादा टीम के खेलने के मुद्दे पर इनके स्तर से समझौता आईसीसी के लिए एक समस्या है क्योंकि ये भी मानना होगा कि हर टीम ऐसा नहीं खेली कि वे वर्ल्ड कप में खेलने के हकदार थे।

इसलिए सवाल फिर से वहीं आ जाता है- आईसीसी के ग्लोबल आयोजन के स्तर और महत्व को कम किए बिना क्रिकेट को कैसे आगे बढ़ाएं? क्या वर्ल्ड कप का मतलब है टॉप क्लास क्रिकेट और टॉप टीमों के बीच मैच या वर्ल्ड क्रिकेट का कोई उत्सव या मेला? इस मामले में लगता है आईसीसी ने सही किया है- 50 ओवर वर्ल्ड कप में एंट्री पर कंट्रोल और सख्त कर लिया और टी20 को क्रिकेट डेवलपमेंट के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

संयोग से इस कड़ी में खुद एक एसोशिएट टीम वाले अमेरिका ने एक बेहतर मंच प्रदान किया- लाखों डॉलर खर्चे, न्यूयॉर्क में जिस पॉप-अप स्टेडियम को बनाने में कई घंटे खर्च किए उसे सभी टीम के न्यूयॉर्क से निकलने से भी पहले, आख़िरी मैच की आख़िरी गेंद फेंके जाने के कुछ ही घंटों के भीतर तोड़ना शुरू कर दिया था। अमेरिकी बाजार से आईसीसी को क्या मिला- ये समय बताएगा।

तब भी टीम यूएसए की कामयाबी इन सभी लिमिट से बहुत बड़ी है और एक ऐसा विकल्प बना है जिसके बारे में कभी सोचा भी न था। अगर अगले आईपीएल ऑक्शन में अमेरिका के कुछ खिलाड़ी भी ऑक्शन लिस्ट में हों तो कोई हैरानी नहीं होगी। मेजर लीग क्रिकेट (एमएलसी) की बढ़ती उड़ान सभी के सामने है। डलास ने न्यूयॉर्क की तुलना में बेहतर पिच और बेहतर क्रिकेट पेश की। एमएलसी न सिर्फ आगे बढ़ेगा- अपने कॉन्ट्रैक्ट पैकेट के वजन की बदौलत दुनिया भर के सबसे बेहतर खिलाड़ियों के लिए एक आकर्षक विकल्प बन गया है। खिलाड़ी अपने द हंड्रेड के कॉन्ट्रैक्ट तोड़कर एमएलसी में जा रहे हैं।

मौसम, पिच और कुछ एकतरफा मैच इस वर्ल्ड कप की चर्चा का हिस्सा रहे लेकिन नई टीमों, नए खिलाड़ियों और नई स्टोरी ने एक नया और दिलचस्प वर्ल्ड कप पेश किया है। कोई नहीं जानता कि अगली कामयाबी की कहानी कौन सी टीम की होगी? तब भी आंख खुली रखनी होगी और इसके लिए केन्या से बेहतर मिसाल और कौन सी होगी- प्रगति हमेशा एकतरफा नहीं होती। नेपाल, अफ़गानिस्तान को टक्कर देने वाली अगली टीम कौन सी बनेगी ये भी नहीं मालूम।

इसलिए अब जिम्मेदारी आईसीसी की है। नेपाल जैसी टीम जिनके पास टेलेंट है तो पूरे देश का सपोर्ट भी- उन्हें ऑक्सीजन दी जानी चाहिए। उनके मैचों के समय काठमांडू में जो नजारा था या ख़ास तौर पर उनके दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध मैच के खत्म होने पर, वह तो भारत में भी देखने को नहीं मिलता। उन्हें और मौका चाहिए ताकि वे इंटरनेशनल खेलते रहें।

इस सब को देखते हुए आईसीसी तारीफ़ की हकदार है और टूर्नामेंट को 20 टीम का बनाने का फैसला सही है। यह तय करना कि एसोशिएट टीमें ग्रुप राउंड में ही बड़ी टीम के साथ सीधे खेलें- वर्ल्ड कप के 50 ओवर वाले स्वरूप से बहुत बेहतर रहा है, जहां ज्यादातर बड़ी टीम सुपर 12 में अपने आप ही पहुंच जाती हैं।

चरनपाल सिंह सोबती

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *