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भारत-इंग्लैंड राजकोट टेस्ट से पहले सौराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन स्टेडियम का नाम बदलकर निरंजन शाह स्टेडियम कर दिया। इस स्टेटमेंट से जुड़ा अगला सवाल यही होगा कि निरंजन शाह कौन हैं? 

खिलाड़ी के तौर पर : 1960 के दशक के बीच से 1970 के दशक के बीच तक सौराष्ट्र के लिए 12 फर्स्ट क्लास मैच खेले। इससे तो स्टेडियम को उनका नाम मिल नहीं सकता।

क्रिकेट एडमिनिस्ट्रेटर के तौर पर : यूं समझ लीजिए कि सौराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन सालों से उनकी ही है- 4 दशक के करीब सेक्रेटरी रहे। यहां तक कि जब लोढ़ा कमेटी की वजह से जब कुर्सी छोड़नी पड़ी तो पारिवारिक कब्जा जारी रखते हुए अपने बेटे जयदेव शाह (वह भी किस दम पर फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेले, सौराष्ट्र के कप्तान बने और आईपीएल भी खेल गए- ये एक और मजेदार चर्चा है) को एसोसिएशन का प्रेसीडेंट बना दिया और इस समय वही हैं एसोसिएशन में नंबर 1। स्टेडियम का नाम बदलने का फैसला पिछले साल अक्टूबर में एससीए की एजीएम में लिया था। – वे बीसीसीआई में कई साल सेक्रेटरी रहे। – बीसीसीआई की कई कमेटी जिनमे एनसीए कमेटी भी है- अलग-अलग पोस्ट पर रहे।

ये 2019 की बात है और तब लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों और बीसीसीआई के बारे में सुप्रीम कोर्ट के आर्डर पर देश में क्रिकेट चल रही थी। सुधार के आदेशों का सेंटर पॉइंट था- स्टेट एसोसिएशन पर मुट्ठी भर अधिकारियों का ‘कब्जा’ खत्म करना। इसने भी इन अधिकारियों के परिवार के सदस्यों को टॉप पद लेने से नहीं रोका। नतीजा- दो ख़ास मिसाल : बिना विरोध एन श्रीनिवासन ने अपनी बेटी रूपा को तमिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन का प्रेसीडेंट और सौराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन में निरंजन शाह ने अपने बेटे जयदेव शाह को प्रेसीडेंट बना दिया।

जयदेव शाह तब सिर्फ 36 साल के थे और बीसीसीआई से जुड़ी किसी भी एसोसिएशन के सबसे कम उम्र के प्रेसीडेंट में से एक बन गए। निरंजन शाह भी आसानी से थोड़े ही हटे थे- जब कोई रास्ता नहीं बचा तो कुर्सी छोड़ी थी। फिर भी एसोसिएशन का रिमोट कंट्रोल तो उनके पास ही रहा।

रूतबा वे कभी भी छोड़ नहीं सके। 2017 में बीसीसीआई ने लोढ़ा पैनल के सुझावों पर सुधार की स्टडी के लिए एक कमेटी बनाई तो उसमें 73 साल के निरंजन शाह को विशेष गेस्ट सदस्य के तौर पर शामिल किया- ये जानते हुए भी कि वे खुद इन सुधारों के निशाने पर हैं। इसी तरह फरवरी 2019 में मना किए जाने के बावजूद नागपुर के वीसीए स्टेडियम में रणजी फाइनल के दौरान सौराष्ट्र टीम ड्रेसिंग रूम में घुस गए। किसी ने बहस और उनके ड्रेसिंग रूम में जाने की वीडियो भी बना ली। इस तरह एंटी करप्शन प्रोटोकॉल तोड़ा और एसीयू ने उनकी शिकायत भी की।

इस पर वे ये तो मान गए कि ड्रेसिंग रूम में गए थे- वजह थी : तीन हफ्ते से अपनी टीम से नहीं मिले थे। दलील थी- अगर ये मैच राजकोट में होता, तो क्या सौराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के सेक्रेटरी/प्रेसीडेंट को ड्रेसिंग रूम में जाने नहीं देते? अपनी गलती नहीं मानी। इसके उलट वे तो राहुल गांधी के वानखेड़े में सचिन तेंदुलकर के रिटायर होने वाले टेस्ट मैच के दौरान सचिन से मिलने की मिसाल देते रहे- अगर एसीयू ने राहुल गांधी को इजाजत दी तो उन्हें क्यों नहीं? बोर्ड ने भी कोई एक्शन नहीं लिया।

सौराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन में निरंजन शाह 1972 से सेक्रेटरी या प्रेसीडेंट थे- वे वाई.एस. शत्रुसल्यसिंहजी (नवानगर के आख़िरी महाराजा) को हटाकर एसोसिएशन में आए थे। तब उनकी मुहिम थी- क्रिकेट एसोसिएशन कोई जागीर नहीं कि राजा महाराजाओं के परिवार का इस पर कब्जा जारी रहे- खुद एसोसिएशन पर उनका पारिवारिक कब्जा आज तक चल रहा है।

ये भारत में ही हो सकता है कि खिलाड़ियों के नाम पर स्टेडियम कम और बीसीसीआई अधिकारियों के नाम पर ज्यादा हैं: एमए चिदंबरम (चेन्नई), एम चिन्नास्वामी (बेंगलुरु), आईएस बिंद्रा (मोहाली), वानखेड़े (मुंबई) और अरुण जेटली स्टेडियम (दिल्ली) इसकी सबसे अच्छी मिसाल हैं। अब लिस्ट में राजकोट स्टेडियम का नाम भी जुड़ गया। खैर ये एक अलग स्टोरी है। 
मजे की बात ये कि दूसरे खेलों के खिलाड़ियों के नाम पर तो फिर भी देश में स्टेडियम हैं- क्रिकेटरों के हिस्से में स्टैंड/गेट ही आ रहे हैं। जालंधर में बिशन सिंह बेदी स्टेडियम है जहां 1 टेस्ट और 3 वनडे खेले पर उसके बाद पंजाब के हिस्से के मैच मोहाली ने छीन लिए। सौराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन ने अपनी प्रेस रिलीज में लिखा- ‘इस रीजन की क्रिकेट के साथ-साथ राष्ट्रीय और इंटरनेशनल स्तर पर क्रिकेट में श्री निरंजन शाह ने महत्वपूर्ण और मूल्यवान योगदान दिया जिसे स्वीकार किया जाना चाहिए।’

सौराष्ट्र में एक क्रिकेट की बड़ी पुरानी विरासत है: रणजीतसिंहजी, ऑलराउंडर वीनू मांकड़ और करसन घावरी यहीं से थे और आजकल चेतेश्वर पुजारा एवं रवींद्र जडेजा नाम आगे बढ़ा रहे हैं। ठीक है इन सब सालों में सौराष्ट्र टीम का घरेलू रणजी ट्रॉफी में नाम चमका और सौराष्ट्र ने मुंबई के प्रभुत्व को भी चुनौती दी। नया स्टेडियम भी बनाया। एसोसिएशन में हाल फिलहाल कोई कलह नहीं और बेहतर क्रिकेट की मिसाल के लिए, ‘सौराष्ट्र स्कूल ऑफ़ क्रिकेट’ का जिक्र होता है। आगे से इस नए नामकरण की बदौलत निरंजन शाह के इसमें योगदान का भी जिक्र होगा। 

  • चरनपाल सिंह सोबती

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