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क्रिकेट सम्राट’ को पढ़ने वाले वाले आज तक इसे दीवानगी की हद तक चाहते हैं 
ये कोई मामूली बात नहीं कि एक पत्रिका जो पिछले एक साल से ज्यादा से नहीं छपी, उसका अभी भी इंतज़ार हो रहा है। सिर्फ यही एक बात बता देती है कि जिन्हें इसे पढ़ने का चस्का लगा – उनके लिए ये क्या थी? जब लगभग 42 साल  (प्रकाशन का दौर : नवंबर 1978 अंक से अप्रैल 2020 अंक तक)  बाद क्रिकेट सम्राट का प्रकाशन रुका- तब वास्तव में पता लगा कि क्रिकेट को चाहने वालों के बीच ही नहीं, देश में जर्नलिज्म की दुनिया में इसने अपने लिए क्या जगह बनाई थी। इसीलिए इंडियन एक्सप्रेस से लेकर मिड डे तक और ‘द प्रिंट’ जैसे कई पोर्टल पर इसका प्रकाशन रुकने की खबर छपी – इसके सफर को सराहा गया।


बहुत कुछ लिखा गया इसकी कई खासियत के बारे में- आखिरकार 42 साल तक लगातार छपते रहना कोई मजाक नहीं। इसी तरह, ये तो अब पता लग रहा है कि ये तो क्रिकेट को चाहने वालों के दिलों में बसने वाली पत्रिका थी और अब  जबकि इसका प्रकाशन रुके एक साल भी बीत गया तो भी इसे चाहने वाले टक टकी लगाए इंतज़ार कर रहे हैं – इस उम्मीद से कि शायद कोई चमत्कार हो जाए और फिर से न्यूज़ स्टैंड पर क्रिकेट सम्राट दिखाई दे जाए। इन्हीं चाहने वालों ने इसे आज भी ‘जिन्दा’ रखा है।  


1978 वह दौर था जब क्रिकेट की लोकप्रियता एकदम बढ़ रही थी (वन डे क्रिकेट शुरू हो गई थी) – टेलीविजन पर क्रिकेट मैच का लाइव टेलीकास्ट शुरू हो गया था। हैरानी ये कि हिंदी क्या, इंग्लिश में भी तब क्रिकेट की कोई पत्रिका नहीं थी। दीवान पब्लिकेशंस भी ‘खेल सम्राट’ पत्रिका निकालते थे। कोई ख़ास बिक्री नहीं थी इसकी पर बिलकुल सही समय पर क्रिकेट की बढ़ती लोकप्रियता की नब्ज़ को पकड़ा और खेल सम्राट को रोककर, क्रिकेट सम्राट शुरू कर दी। मैंने उस पहले अंक में भी लिखा था। 


उसके बाद तो जैसे जैसे क्रिकेट की लोकप्रियता का ग्राफ ऊपर गया (1983 में वर्ल्ड कप जीत से क्रांति आई और कलर टेलीकास्ट का इसमें ख़ास योगदान) क्रिकेट सम्राट का ग्राफ भी ऊपर गया। सबसे खास बात थी इसमें दी जाने वाली जानकारी का फार्मूला – हर अंक में पूरी दुनिया की क्रिकेट को ‘गागर में सागर’ की तरह बता देने का इरादा था। इसीलिए एक तरफ दीप्ति शर्मा जैसी इंटरनेशनल क्रिकेटर ने ये कहा कि क्रिकेट सम्राट में ‘क्रिकेट कोचिंग’ के आर्टिकल पढ़कर क्रिकेट खेलना सीखा तो दूसरी तरफ कई बड़े क्रिकेट जर्नलिस्ट ये मानते हैं कि देश के दूर के शहर में खेले रणजी ट्रॉफी मैच की जो खबर उन्हें अपने बड़े अखबार में नहीं मिलती थी- क्रिकेट सम्राट में मिलती थी। ऐसे मैच की रिपोर्ट/ स्कोरकार्ड जुटाना कोई मजाक नहीं था। वह इंटरनेट का जमाना नहीं था कि एक क्लिक पर स्कोर कार्ड सामने- विश्वास कीजिए कई बार तो टेस्ट और वन डे के स्कोर कार्ड में 11 नाम पूरे करना भी मुश्किल हो जाता था। विजडन ने भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ाने में हिंदी के योगदान का जिक्र करते हुए इस पत्रिका के योगदान का भी जिक्र किया। 


कुछ भी हुआ, हर अंक छपा और न्यूज़ स्टैंड तक पहुंचा- न तो 1984 के दंगे इसे रोक पाए और न ही देश के आम चुनाव या बदलती सरकारें। आज जिस ‘क्रिकइंफो’ पोर्टल को क्रिकेट का गूगल कहा जाता है- जब वे बाज़ार में आए थे तो अपनी पहचान बनाने के लिए क्रिकेट सम्राट में अपना विज्ञापन देते थे। शुरू के सालों में साधारण प्रिंटिंग, इधर – उधर से जुटाई फोटो पर धीरे धीरे सब कुछ बदल गया- पूरी पत्रिका रंगीन, बढ़िया फोटो, पोस्टर और नए नए ऐसे कॉलम  जो क्रिकेट की वह जानकारी देते थे सो सीधे क्रिकेट को चाहने वालों के दिल को छूती थी। विश्वास कीजिए इस दौर में इसे मासिक से पाक्षिक ( हर 15 दिन बाद ) बनाने का फैसला ले लिया था और इसकी खबर देने वाले विज्ञापन भी छपे पत्रिका में। बहरहाल ऐसा हुआ नहीं। 


तो फिर ऐसी नौबत क्यों आई कि पत्रिका का प्रकाशन ही रुक गया? इसके लिए कोई एक नहीं ढेरों वजह जिम्मेद्दार हैं- टेलीविजन ने पढ़ने का समय छीनना शुरू कर दिया, ट्रेन में सफर के दौरान जो ‘रसाला (इनमें क्रिकेट सम्राट भी थी)’ पढ़ते थे, वे सस्ते हो रहे इंटरनेट की बदौलत मोबाइल पर फिल्म/ सीरियल और गाने देखने लग गए, मैचों की गिनती इतनी बढ़ गई कि पत्रिका में महीने बाद आने वाली जानकारी पुरानी लगने लगी, जो विज्ञापन इस जैसी पत्रिका को मिलते थे वे टेलीविज़न ने छीन लिए। इसी तरह से और भी कई। ये सब के साथ था और ऐसे में बदलाव जरूरी था। क्रिकेट सम्राट का पोर्टल होना जरूरी था ताकि खबर देने की तेजी की रेस में शामिल रहें। हालाँकि क्रिकेट सम्राट में छपने वाले लेख बिलकुल अलग जानकारी देते थे (यही वजह है कि आज भी इसका इंतज़ार किया जा रहा है) पर सर्क्युलेशन गिरता गया। आख़िरी चोट कोविड ने दी/ लॉकडाउन में देश ही रुक गया- पत्रिका छपे तो दूसरे शहरों तक पहुंचे कैसे – ट्रेन बंद. बस बंद, पोस्टल सर्विस बंद. पहुँच भी जाती तो बिकती कहाँ – बाज़ार बंद, मैगज़ीन स्टाल बंद। सभी फैक्टर मिल गए और जो हुआ वह आप जानते ही हैं।  


यही उपलब्धि है कि आज भी इसके शुरू होने का इंतज़ार किया जा रहा है – क्या ऐसा होगा? इस सवाल का जवाब सिर्फ भविष्य ही दे सकता है।  – चरनपाल सिंह सोबती

6 thoughts on “क्रिकेट सम्राट एक सफ़रनामा”
  1. क्रिकेट से ज्यादा यह तुम्हारी अपनी जिंदगी का सफरनामा है बल्कि यह आनन्द का जीवन दर्पण है। बहुत अच्छा लगा देख कर।

  2. आपसे निवेदन है, की आप हमारी बात क्रिकेट सम्राट के प्रकाशक आनंद दीवान तक पहुंचाए अगर मासिक संभव न हो तो क्रिकेट का एक वार्षिक अंक प्रकाशित किया जाए। इसके अलावा क्रिकेट सम्राट को डिजिटली एक पोर्टल के रूप में जिंदा रखा जाए।

  3. SUR,PLEASE BRING BACK CRICKET SAMRAT MAGAZINE ,I STILL EAGER TO READ ,I HAVE 100 PLUS CRICKET SAMRAT MAGAZINES SINCE 2006 BUT I STILL BELIEVE WILL BE RE-START 🙏🙏🙏🙏🙏

  4. sir i was regular reader of cricket samrat from 1979. i was eagarly waiting for it.Now every thing has been started please restart my cricket samrat from now onwards.we are all with you.please reply.

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